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शीर्षक: किराए का शहर और बढ़ती EMI: क्या हम सिर्फ बिल भरने के लिए कमा रहे हैं?

“नमस्कार, मैं हूँ [आपका भरत कुमार और आज हम बात करेंगे उस सुनहरे जाल की जिसे हम ‘सक्सेसफुल लाइफ’ कहते हैं। साल 2026 की चमचमाती सड़कों और ऊँची इमारतों के बीच एक मध्यमवर्गीय इंसान की सिसकती जेब की कहानी छिपी है। आज एक प्रोफेशनल अपनी आधी सैलरी सिर्फ एक छत के नीचे सोने के लिए दे देता है। सवाल बड़ा है—क्या हम वाकई तरक्की कर रहे हैं, या हम सिर्फ बैंकों के लिए किश्तें जुटाने वाली एक मशीन बनकर रह गए हैं? देखिए हमारी खास रिपोर्ट— किराए का शहर और EMI का बोझ।”

“ये सुबह की भागदौड़ किसी मंजिल को पाने के लिए है या महीने की पहली तारीख को कटने वाली EMI के डर से? आज एक औसत कर्मचारी की सैलरी का 40 से 50 फीसदी हिस्सा मकान मालिक के खाते में या बैंक के होम लोन सेक्शन में चला जाता है। एजुकेशन लोन से करियर की शुरुआत होती है, और फिर कार लोन, होम लोन और पर्सनल लोन का ऐसा चक्रव्यूह शुरू होता है जिससे बाहर निकलना नामुमकिन सा लगता है।”

“मैं इस वक्त शहर के उस हिस्से में हूँ जहाँ हज़ारों नए फ्लैट्स बन रहे हैं। लोग खुश हैं कि उनके पास अपना घर होगा, लेकिन इस खुशी की कीमत बहुत भारी है। लोगों से बातचीत में एक ही बात सामने आती है—’कमा तो रहे हैं, पर बच कुछ नहीं रहा।’ दिखावे की इस अर्थव्यवस्था में (Show-off Economy), सोशल मीडिया पर अच्छी फोटो डालने के चक्कर में हम अपनी बचत को दांव पर लगा रहे हैं। आज गैजेट्स और लाइफस्टाइल जरूरत नहीं, बल्कि एक मानसिक दबाव बन चुके हैं।”

“विशेषज्ञों का मानना है कि इस आर्थिक दबाव का सीधा असर हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। दफ्तरों में बढ़ता ‘बर्नआउट’ और घरों में घटता संवाद, इसी वित्तीय खींचतान का नतीजा है। जब जेब खाली होती है, तो रिश्तों में भी तनाव घर करने लगता है। हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो अमीर दिखने के लिए हर दिन खुद को कर्ज में डुबो रही है
“वक्त आ गया है कि हम ‘फाइनेंशियल लिटरेसी’ को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ। स्कूलों में पैसे के प्रबंधन की शिक्षा उतनी ही जरूरी है जितनी गणित या विज्ञान की। साथ ही, अब सरकार को भी मिडिल क्लास की इस खामोश चीख को सुनना होगा। क्या टैक्स स्लैब में राहत या हाउसिंग पॉलिसी में बदलाव इस बोझ को कम कर सकते हैं? यह एक बड़ा सवाल हे

“किराए का कमरा हो या किश्तों वाला घर, सुकून की नींद तभी आती है जब जेब और जज्बात दोनों नियंत्रण में हों। अगली बार जब आप किसी लोन के कागज पर साइन करें, तो खुद से पूछिएगा—क्या आप घर खरीद रहे हैं, या अपनी आजादी बेच रहे हैं?

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