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शीर्षक: “बचपन की चोरी: क्या 5G की रफ़्तार में हमारे बच्चों का ‘मैदान’ कहीं खो गया है?”

नमस्कार, आप देख रहे हैं इंडियन प्रेस यूनियन। मैं भरत कुमार
क्या आपको याद है वह आखिरी बार, जब आपने अपने मोहल्ले की गलियों में बच्चों के शोर और क्रिकेट की गेंद के टप्पे की आवाज़ सुनी थी? आज 2026 की शामें बदल गई हैं। पार्कों में सन्नाटा है, लेकिन कमरों के बंद दरवाजों के पीछे स्मार्टफोन का शोर है। आज का बच्चा चलना सीखने से पहले स्क्रीन को ‘स्वाइप’ करना सीख रहा है। सवाल बड़ा है—क्या 5G की इस सुपरफास्ट रफ़्तार में हमारे बच्चों का मासूम बचपन कहीं पीछे छूट गया है? देखिए इंडियन प्रेस यूनियन की यह विशेष रिपोर्ट— ‘बचपन की चोरी’।”

“एक रिपोर्टर के तौर पर जब मैं आज के मोहल्लों का दौरा करता हूँ, तो हकीकत डराने वाली लगती है। स्मार्टफोन अब सिर्फ एक गैजेट नहीं, बल्कि एक ‘डिजिटल नैनी’ (Digital Nanny) बन गया है। व्यस्त माता-पिता अपनी सुविधा के लिए बच्चे के हाथ में फोन थमा देते हैं, लेकिन क्या हम जानते हैं कि हम उनकी एकाग्रता और मानसिक विकास का सौदा कर रहे हैं?

यूट्यूब और मोबाइल गेम्स के एल्गोरिदम बच्चों के नन्हे दिमागों को घंटों बांधे रखते हैं। साल 2026 के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि 5 से 12 साल के बच्चे औसतन दिन के 5 से 6 घंटे स्क्रीन पर बिता रहे हैं। इसका सीधा असर उनकी आंखों की रोशनी, नींद की कमी और बढ़ते चिड़चिड़ेपन के रूप में सामने आ रहा है।”

“मैं इस वक्त शहर के एक ऐसे पार्क में हूँ जहाँ झूले तो हैं, लेकिन उन पर बैठने वाले बच्चे गायब हैं। डिजिटल दुनिया के इस मायाजाल ने बच्चों को ‘एंटी-सोशल’ बना दिया है। जो बच्चा स्क्रीन से बात करना सीख रहा है, वह असल ज़िंदगी में लोगों से आंख मिलाकर बात करने में हिचकता है। हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो ‘सोशल मीडिया’ पर तो एक्टिव है, लेकिन पड़ोस के दोस्त का नाम तक नहीं जानती। मिट्टी से दूर और स्क्रीन के करीब—यह बचपन की एक खामोश चोरी है जिसे हम प्रगति का नाम दे रहे हैं।
“मनोचिकित्सकों की चेतावनी साफ है—अगर आज नहीं संभले, तो भविष्य धुंधला होगा। समाधान मुश्किल नहीं है, बस शुरुआत की ज़रूरत है। हफ्ते में एक दिन ‘नो गैजेट डे’ मनाना और बच्चों को फिर से पेंटिंग, मिट्टी के खिलौनों और मैदानी खेलों की तरफ ले जाना ही असली रास्ता है। तकनीक प्रगति के लिए है, बचपन छीनने के लिए नहीं

“अगली बार जब आप अपने बच्चे को रोता देख उसके हाथ में फोन थमाएं, तो एक पल रुककर सोचिएगा—क्या आप उसे चुप करा रहे हैं या उसकी कल्पनाशीलता की हत्या कर रहे हैं? बचपन एक ही बार मिलता है, इसे गैजेट्स की भेंट मत चढ़ने दीजिए।

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